पोस्ट ऑफ़िस – गुज़रा ज़माना

बहुत समय पहले, जब हिंदी साहित्य से मेरे परिचय की शुरुआत हो ही रही थी, गणेश चतुर्थी समारोहों की एक रात्रि को मुझे प्रख्यात व्यंग्यकार श्रद्धेय शरद जोशी जी को सुनने का सौभाग्य मिला । तब मैं झाबुआ (म.प्र.) में स्कूल में पढ़ता था । … पढ़ना जारी रखें पोस्ट ऑफ़िस – गुज़रा ज़माना

हाइकु

ज़िंदगी बीती सपनों के जाल में नींद न टूटी। विस्तृत नभ सिमटा टुकड़े में मेरे आँगन। घर है सीला बाहर खिली धूप विचित्र लीला। हैं अजनबी ख़ुद से हम सभी जानें ख़ुद को। स्वच्छंद मन कहना कब माने उड़ना जाने। लो, फूँका घर ले ली … पढ़ना जारी रखें हाइकु

दीपोत्सव हाइकु

प्रत्येक मन रहे प्रकाशमय शुभ दीवाली ।   दीप जलाएँ मन के आँगन में, तम भगाएँ ।   हो आलोकित दिल के प्रकाश से जीवन सारा ।   राह दिखाए ह्रदय प्रकाशमय न भटकाए ।   फ़ीकी लगती दुनिया की दिवाली यूँ बिन तेरे । … पढ़ना जारी रखें दीपोत्सव हाइकु

हाइकु – धूप

लो दिन बीता जोहता रहा बाट धूप न आई । बंद कमरे रहें अंधकार में खोल दो उन्हें । धूप की कमी बंद गलियारों में रहती सदा । धूप बग़ैर ये जग थम जाए अँधेरा छाए । खोलो कमरे आने दो धूप हवा मिटे सीलन … पढ़ना जारी रखें हाइकु – धूप

हाइकु

शिकंजा सख्त नियति के हाथों का, हिल न पाऊँ ।   भ्रम का जाल सख्त डोर से बुना, काट न पाऊँ ।   दर्द दवा का ज़ख्म से भी गहरा और रुलाए ।   दूर किनारे, मिलने की खातिर पुल बनाए ।   फँसेगा कभी … पढ़ना जारी रखें हाइकु

किस काम की यह ईवीएम !

तरक्की के नाम पर हड़बड़ी का क्या ज़माना आ गया है साहब कि जिंदगी का सारा लुत्फ़ ही ख़त्म हो चला है । इस नए जमाने की तरक्की से पहले वो भी क्या दिन थे कि समय की कोई हड़बड़ी नहीं होती थी । हर … पढ़ना जारी रखें किस काम की यह ईवीएम !

हाइकु

मीठा सा रस तेरी प्यारी बातों में, सुनता रहूँ । गुनता रहूँ वो अनकही बातें जो मैंने सुनीं । आँखों ने कही वाणी कह न पाई गहरी बातें । दिल की बातें जो दिल से समझी लगी सरल । जब से चखा तेरी बातों का … पढ़ना जारी रखें हाइकु